उम्मते मुस्लिमा सबके लिए

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इबादत का हुक्म

अल्लाह तआला ने सारे इन्सानों को अपनी इबादत के लिए पैदा किया है । और उन्हें इसी बात का हुक्म भी दिया कि सारे इन्सान अपने रब की ही इबादत करें ।

कुरआन को उसकी तरतीब से पढ़ने पर सबसे पहला हुक्म भी इबादत का ही मिलता है । जिसे अल्लाह तआला ने सिर्फ मस्जिद के इमामों, नमाजियों या मुसलमानों को ही नहीं दिया है । बल्कि कायनात में रहने वाले इन्सानों को दिया फरमाया की “ऐ इन्सानों अपने रब की इबादत करो जिसने तुम्हे और तुमसे पहले के लोगो को पैदा किया ताकि तुम परहेजगार बन जाओ ।“ (क़ुराआन-2:21)

 

कुरआन का पैगाम

कुरआन एक मुक़द्दस किताब है जिसे अल्लाह तआला ने हिदायत के लिए उतारा है । यह लारयेब किताब कुरआन पैगामे रहमान और अल्लाह की तरफ से नसीहत है । जो सीधे रास्ते की ओर रहनुमाई करती है । मगर सवाल ये है कि अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद को किसकी हिदायत? किसकी नसीहत? और किसकी रहनुमाई के लिए उतारा है? क्या सिर्फ आलिमों के लिए? क्या सिर्फ हाफिज़ो के लिए? क्या सिर्फ मदरसों के लिए? नहीं! बल्कि अल्लाह तआला ने फरमाया “रमज़ान का महीना है जिसमे कुरआन उतारा गया जो सारे इन्सानों के लिए हिदायत है” (कुरआन-2:185) कोई भी इन्सान किसी भी धर्म या मज़हब का हो या किसी भी जात-पात का हो कुरआन सबके लिए हिदायत है ।

कुरआन का हुक्म, उसका पैगाम और उसकी नसीहत कायनात के सारे इन्सानों के लिए है । इसीलिए कुरआन बिना किसी तरह के भेदभाव के सारे इन्सानों को एक समान मुखातब करता है । कहीं सारे इन्सानों को मुखातब करते हुए कहता है “ऐ इन्सानों तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से नसीहत आ चुकी है” (क़ुरआन-10:57) कहीं कहता है “ऐ इन्सानों तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से बुरहान और दलील आ चुकी है” (क़ुराआन-4:174) कहीं सारे इन्सानों को हुक्म देता है कि “ऐ इन्सानों अपने रब से डरो बेशक क़यामत का ज़लज़ला बहुत बड़ी चीज़ है”। (कुरआन-22:1) कहीं तौहीद की तालीम देते हुए कहता है “यह कुरआन सारे इन्सानों के लिए पैगाम है कि इसके ज़रिये बाखबर कर दिये जायें और पूरी तरह से मालूम करलें कि अल्लाह एक ही इबादत के लायक है और ताकि अक्लमंद लोग सोच समझ लें” । (कुरआन-14:52) और कहीं अपनी वअज़ और नसीहत को सारे इन्सानों के लिए बताते हुए कहता है कि “यह कुरआन सारे जहाँनों के लिए नसीहत (उपदेश) है” । (कुरआन-81:27)

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की रिसालत

दुनिया में तशरीफ़ लाने वाले सारे रसूलों में मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म)  अल्लाह तआला के आखिरी रसूल हैं । अल्लाह तआला ने आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) को बशीर व नज़ीर, सिराजे मुनीर , दाई व हादी और रसूले आमीन बनाकर भेजा । मगर सवाल है कि

किसके लिए रसूल बनाकर भेजा?

क्या सिर्फ अरबो के लिए?

क्या सिर्फ मुसलमानों के लिए?

क्या सिर्फ किसी खास रंग या नस्ल वालों के लिए?

क्या सिर्फ किसी खास मुल्क या वतन वालो के लिए?

नहीं! बल्कि जहाँ में रहने वाले सारे इन्सानों के लिए रसूल बनाकर भेजा । अल्लाह तआला ने फरमाया “[ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म)] कह दीजिए की ऐ इन्सानों मै तुम सबकी तरफ उस अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूँ जिसकी बादशाही तमाम आसमानों और ज़मीन में हैं” । (क़ुराआन-7:158)

कोई भी इन्सान किसी भी रंग या नस्ल का हो, किसी भी मुल्क या देश का हो दुनिया के तमाम इन्सानों के लिये मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) रसूल हैं । आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) सारे इन्सानों को रब का पैगाम सुनाने के लिए भेजे गए । इसीलिए आप ने सिर्फ कुछ  महदूद लोगो को ही नही बल्कि कायनात के सारे इन्सानों को तौहीद की दावत देते हुये फरमाया कि “ऐ इन्सानों कहो ला इलाहा इल्लल्लाह कामयाब हो जाओगे“ (इब्ने हिब्बान : 6562) आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) सारे इन्सानों को अल्लाह की तरफ बुलाने वाले दाई और रहनुमा हैं । अल्लाह तआला ने आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) को तमाम लोगों के लिए खुश्खबरी देने वाला और और डराने वाला बनाकर भेजा । और कुरआन में फरमाया कि “हमने तुमको [ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म)] तमाम इन्सानों के लिए खुश्खबरी देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते हैं” । (कुरआन-34:28) कि आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) सबके लिए भेजे गए और आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की रिसालत, तालीमात और पैगाम सबके लिए है ।

 

उम्मते मुस्लिमा

तमाम उम्मतों में उम्मते मुस्लिमा अफज़ल तरीन उम्मत है । जिसे अल्लाह तआला ने इबादत का हुक्म , कुरआन का पैगाम और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की रिसालत की दावत व तब्लीग के ज़रिये भलाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने के लिए निकाला है ।

मगर सवाल यह है कि दावत व तब्लीग किसको करें ?

किसे भलाई का हुक्म दे और किसे बुराई से रोके?

क्या सिर्फ जान पहचान के अपने से कमज़ोर लोगो को?

क्या सिर्फ मस्जिद में आने वाले चंद मुसलमानों को या सिर्फ अपने मसलक के दीनदार लोगो को ?

नहीं! बल्कि सारे इन्सानों के लिए जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया कि “तुम बेहतरीन उम्मत हो जो इन्सानों के लिए निकाली गई है तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो” । (कुरआन-3:110)

उम्मते मुस्लिमा धरती पे बसने वाले सारे इन्सानों की भलाई और रहनुमाई के लिए निकली गई है । चाहे कोई अमीर हो या गरीब, जानता हो या नेता, पोलिस वाले हों या मुजरिम, फिल्मी अदाकार हो या मैच के खिलाड़ी, तिजारत पेशा लोग हों या धार्मिक गुरु, लामज़हब लोग हों या गैर मज़हब के मानने वाले उम्मते मुस्लिमा सबके लिए है । सबको भलाई का हुक्म देने और सबको बुराई से रोकने के लिए है । जिस तरह इबादत का हुक्म, कुरआन का पैगाम और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की  रिसालत सबके लिए है उसी तरह उम्मते मुस्लिमा भी सबके लिए है । कि सारे इन्सानों तक पहुँच कर बिला खौफ व झिझक उन्हें भलाई का हुक्म दे और बुराई से रोके । यही उम्मते मुस्लिमा का सबसे बड़ा मकसद और सबसे अहम् फरीज़ा है । इसी अज़ीम मकसद के लिए अल्लाह तआला ने इस उम्मत को निकाला है । और इसी काम की वज़ह से  इस उम्मत को खैरे उम्मत का लक़ब दिया है ।

अल्लाह तआला के सारे पैगम्बर इसी मकसद के लिए भेजे गये थे । और आखरी पैगम्बर (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) का भी दावत व तब्लीग और भलाई का हुक्म करना और बुराई से रोकना ही असल मकसद था । इसी मकसद को लेकर आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) अरब में उठे । और जिन लोगो ने आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की दावत को कबूल किया उनके साथ मिलकर आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) अपने मिशन ‘अम्र बिल मअरूफ़ नहय अनिल मुन्कर’ के जरिये सबकी हिदायत व रहनुमाई करते रहे । चाहे वह मक्का के मुश्रिक हों या मदीने के मुनाफ़िक, देहात के बददु हों या सरदारे कुरेश, मदीने के यहूदी हों या नज़रान के ईसाई आप सबको दावत व तब्लीग करते रहे । जिसके नतीज़े में अरब की कौम जहाँ जुल्म व सितम एक आम चीज़ थी । और कौम शिर्क, ज़िना, रंगनस्ल के बिगाड़, क़त्ल, शराब नोशी जैसी कई बुराइयों में डूबी हुई थी। वही कौम दुनिया की सबसे अफज़ल कौम बनकर सिर्फ उभरती ही नहीं है बल्कि दुनिया को भी बेहतर बनने का सबक देते हुई नज़र आती है । जिसके बारे में अर्श वाले ने फरमाया था कि

“अल्लाह इनसे राज़ी यह अल्लाह से राज़ी” (क़ुराआन-9:110)

और कहने वाले ने कहा कि :-

“जो खुद न थे राह पे औरों के हादी बन गए

क्या नज़र थी जिसने मुर्दों को मसीहा कर दिया”

पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) के बाद दीन को लोगो तक पहुँचाने की जिम्मेदारी पूरी तरह सहाबा (रज़िअल्लाहु अन्हुम अज़मईन) के कंधो पे आ गई । सहाबा (रज़िअल्लाहु अन्हुम अज़मईन) हर मामले की तरह दावत व तब्लीग के मामले में भी आप के राह पे गामजन रहे । और दीन को अपने घर और समाज तक महदूद नहीं रखा बल्कि आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) के फ़रमान “जो हाज़िर है वह गायब तक पहुँचा दे” (सही बुखारी :1739) के मुताबिक़ पूरी दुनिया में फ़ैल गये । और दुनिया वालो को तौहीद का दर्स देकर मुन्करात से रोकना शुरू कर दिया । कुरआन व सुन्नत की रोशनी चारों तरफ फैला दी । तागूत का मलियामेट किया और बातिल का सर कुचल कर उसका नाश कर दिया । बिना किसी मलामत करने वाले की मलामत की परवाह किये जुल्म करने वाले ज़ालिमो के हाथ रोक दिये भलाई करने वाले हाथो को मजबूती  दी । और जुल्म सितम का नाम व निशान मिटाकर अल्लाह का फर्ज़ किया हुआ ‘अम्र बिल मअरूफ व नहय अनिल मुन्कर’ का फरीज़ा कमा हक्क़हु अदा कर दिया । जिसकी बरकत से मगरिब व मशरिक में ला इलाहा इल्लल्लाह की सदायें गुजने लगीं । लोग गिरोह दर गिरोह दीने इस्लाम में दाखिल होते गये । इस्लाम की रोशनी फैलते ही दुनिया इन्साफ व अम्नो अमान पर मब्नी एक खुशहाल और बेमिसाल गुलशन में बदल गई । जब तक उम्मते मुस्लिमा ‘अम्र बिल मअरूफ नहय अनिल मुन्कर’ के फ़रीज़े को सही ढंग से अंजाम देती रही उस वक़्त तक ये उम्मत दुनिया की इमामत व कयादत करती रही । और हर जगह सुख शांति कायम रही ।

 

मगर जब इस काम से उम्मत ने मुँह मोड़ा और उसका हक़ अदा करने में कोताही की तो फिर उम्मते मुस्लिमा की अज़मत ज़िल्लत में और बुलंदी पस्ती में बदल गई । और ज़ालिमो के दिलो से मुसलमानों का रोअब खत्म हो गया जिसका फायदा उठा कर ज़ुल्म करने वालो ने ज़ुल्म व सितम का  बाज़ार  गरम कर दिया है । और सब जगह गैरुल्लाह की इबादत, कत्ल व खूरेंजी, फ़िस्क व फुजूर जैसी कई बुराइयाँ आम कर दी है । जिससे दुनियाये इन्सानियत बुराइयों के दल-दल में डूबने लगी है । और हर तरफ बदअम्नी और फितना फसाद का दौर-दौरा हो गया है ।

 

अब जरुरत है कि उम्मते मुस्लिमा आगे बढ़े और ‘अम्र बिल मअरूफ नहय अनिल मुन्कर’ के फ़रीज़े को बिलकुल उसी तरह से अंजाम दे जैसा पैगम्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) और असलाफ़ ने अंजाम दिया था ।  ताकि मज़लूमों की मदद हो और ज़ालिम ज़ुल्म करने से रुक सके ।  शिर्क, ज़िना, दहशतगर्दी, क़त्ले-आम, ज़ुल्म व सितम जैसी सारी बुराइयों का नाम निशान मिट सके । दुनिया इन्साफ अम्न व अमान से भर जाये ।  उल्फत व मोहब्बत का खुशगवार माहौल बनें ।  लोग गुमराही के अन्धेरो से निकल सिराते मुस्तक़ीम की रौशन राह पे गामजन हो जायें । और सब एक रब की बन्दगी करने वाले बनकर आपस में भाई-भाई की तरह समाज में मिल-जुल कर रहने वाले बन जायें ।

नबी (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की बशारत है कि “यह दीन वहाँ तक पहुँचेगा जहाँ तक रात और दिन का उलट फेर ज़ारी है । अल्लाह तआला रुए ज़मीन पर कोई कच्ची झोपड़ी या पुख्ता मकान ऐसा नहीं छोड़ेगा जिसमें दीन दाखिल न हो ।”(मुस्नद अहमद 4 ⁄⁄⁄ 103)

अहमद अनवार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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कलमा-ऐ-तौहीद : अल्लाह के सिवा कोई सच्चा मअबूद नहीं

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 بسم الله الرحمن الرحیم

الحمد لله رب العالمين والصلاة والسلام على أشرف الأنبياء والمرسلين ، نبينا محمد وعلى آله وصحبه أجمعين ، وبعد

कलमा-ऐ-तौहीद का मतलब और तर्जुमा

कलमा-ऐ-तौहीद :  لَا إِلٰهَ إِلَّا ٱلله  ला इलाहा इल्लल्लाह

कलमा-ऐ-तौहीद का अर्थ :

لا     –   ला  –  नहीं

إله  –   इलाह –  सच्चा उपास्य

إلا   –     इल्ला  –     अलावा

الله   –   अल्लाह  –   अल्लाह

अल्लाह के सिवा कोई सच्चा मअबूद (उपास्य) नहीं

इलाह  =         उपास्य           +           सच्चा

(कुरआन सूरह हुद:26)              (कुरआन सूरह हज:62)

 

सबूत  

أَن لَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ ۖ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ

तुम सिर्फ अल्लाह ही की इबादत करो मुझे तो तुम पर दर्दनाक दिन के अज़ाब का डर है  (कुरआन सूरह हूद 26)

ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِ هُوَ الْبَاطِلُ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ

ये सब इसलिए की अल्लाह ही हक़ है और उसके सिवा जिसे भी पुकारते हैं वह बातिल हैं बेशक अल्लाह ही बुलंदी वाला किब्रियाई वाला है (कुरआन सूरह हज 62)

कलमा-ऐ-तौहीद की अहमीयत, फ़ज़ीलत और हुक्म                           

अहमीयत

1: अरकाने  इस्लाम का पहला रूक्न है (सहीह बुखारी-8)

2: सारे रसूलों की यही दावत थी (कुरआन सूरह नहल 36)

फायदा

धरती का अधिकार, शरियत का पालन होना और सुख शांती मिलना (कुरआन सूरह नूर 55)

हुक्म

फ़र्ज़ है क्योंकि इसके बिना कोई मुसलमान हो ही नहीं सकता

सबूत

بُنِيَ الإِسْلاَمُ عَلَى خَمْسٍ شَهَادَةِ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَإِقَامِ الصَّلاَةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَالْحَجِّ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ

इस्लाम की बुनियाद पाँच चीजों पर है: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला के बन्दे और उसके रसूल (पैगम्बर) हैं, नमाज़ पाबंदी से अदा करना, ज़कात देना, बैतुल्लाह का हज करना और रमज़ान के रोज़े रखना (सहीह बुखारी-8)

وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ

हमने हर उम्मत में पैगम्बर भेजा कि (लोगो) सिर्फ अल्लाह की इबादत करो और उसके सिवा तमाम उपास्यो से बचो (कुरआन सूरह नहल-36)

وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّن بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا ۚ يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ

तुम में से उन लोगो से जो ईमान लाये हैं और नेक काम किये हैं अल्लाह तआला वादा फरमा चुका है कि उन्हें जरूर ज़मीन में आधिकारी बनायेगा जैसे कि उन लोगो को आधिकारी बनाया था जो उनसे पहले थे और यकीनन उनके लिए उनके इस दीन को मजबूती के साथ जमा देगा जिसे उनके लिए वह पसंद कर चुका है, और उनके इस डर और खौफ को शांति व अमन में बदल देगा, वह मेरी इबादत करेंगे, मेरे साथ किसी को भी साझी न ठहरायेंगे इसके बाद भी जो लोग नाशुक्री करें और कुफ्र करें तो वे बेशक नाफरमान हैं (कुरआन सूरह नूर-55)

कलमा-ऐ-तौहीद के अरकान

1-नफी (इन्कार)

हर झूठे उपास्य की इबादत का इन्कार करना चाहे वह उपास्य:

बुत, पत्थर या पेड़ हो (कुरआन सूरह नूर-55)

सूरज या चाँद हो (कुरआन सूरह फुसीलत-37)

फ़रिश्ते,अंबिया या औलिया हों (कुरआन सूरह आले ईमरान-80)

 

 

 

 

2-इस्बात (इक़रार)

सारी इबादतें सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला के लिए करना चाहे ये इबादत:

नमाज़, ज़कात (कुरआन सूरह बय्यिनह 5)

हज (कुरआन सूरह आले ईमरान-97)

नज्र व नियाज़ (कुरआन सूरह इन्सान-7)

डर (कुरआन सूरह आले ईमरान-175)

दुआ कुरआन सूरहगाफिर-40)

मदद (कुरआन सूरह फातिहा-4)

क़ुरबानी (कुरआन सूरह कौसर-2)

 

सबूत:

 

 وَمَنَاةَ الثَّالِثَةَ الْأُخْرَىٰ  أَفَرَأَيْتُمُ اللَّاتَ وَالْعُزَّىٰ 

क्या तुमने लात और ऊज्ज़ा को देखा (गौर व फिक्र किया) और मनात तीसरे  पिछले को  (कुरआन सूरह नज्म 19-20)

وَمِنْ آيَاتِهِ اللَّيْلُ وَالنَّهَارُ وَالشَّمْسُ وَالْقَمَرُ ۚ لَا تَسْجُدُوا لِلشَّمْسِ وَلَا لِلْقَمَرِ وَاسْجُدُوا لِلَّهِ الَّذِي خَلَقَهُنَّ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ

और दिन-रात और सूरज चाँद भी (उसी की) निशानियों में से है तुम सूरज को सज्दा न करो न चाँद को बल्कि सज्दा उस अल्लाह के लिए करो जिसने उन सबको पैदा किया है अगर तुम्हे उसकी इबादत करनी है तो (कुरआन सूरह फुसीलत-37) 

وَلَا يَأْمُرَكُمْ أَن تَتَّخِذُوا الْمَلَائِكَةَ وَالنَّبِيِّينَ أَرْبَابًا ۗ أَيَأْمُرُكُم بِالْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ

और ये नहीं हो सकता कि वह तुम्हे फरिश्तों और नबियों को रब बनाने का हुक्म दे, क्या वह तुम्हारे मुसलमान होने के बाद भी तुम्हे कुफ्र का हुक्म देगा (कुरआन सूरह आले ईमरान-80)

 وَيُقِيمُوا الصَّلَاةَ وَيُؤْتُوا الزَّكَاةَ ۚ وَذَٰلِكَ دِينُ الْقَيِّمَةِ

और नमाज़ क़ायम रखें और ज़कात देते रहे यही है दीन सीधी मिल्लत का (कुरआन सूरह बय्यिनाह-5)

وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا

अल्लाह तआला ने उन लोगो पर जो उसकी ताक़त रखते हैं इस घर (काबा) का हज फर्ज़ कर दिया है (कुरआन सूरह आले ईमरान-97)

يُوفُونَ بِالنَّذْرِ وَيَخَافُونَ يَوْمًا كَانَ شَرُّهُ مُسْتَطِيرًا

जो नज़र पूरी करते हैं और उस दिन से डरते हैं जिसकी बुराई चारो तरफ फ़ैल जाने वाली है (कुरआन सूरह इन्सान-7)

إِنَّمَا ذَٰلِكُمُ الشَّيْطَانُ يُخَوِّفُ أَوْلِيَاءَهُ فَلَا تَخَافُوهُمْ وَخَافُونِ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

ये खबर देने वाला शैतान ही है जो अपने दोस्तों से डराता है तुम उन काफिरों से न डरो और मेरा ही खौफ रखो अगर तुम मोमिन हो (कुरआन सूरह इन्सान-7)

وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ

और तुम्हारे रब का फरमान है कि मुझसे दुआ करो मैं तुम्हारी दुआओं को क़बूल करूंगा यक़ीन मानों कि जो लोग मेरी इबादत से मुँह मोड़ते हैं बहुत जल्द ही वह रुस्वा हो कर जहन्नम में पहुँच जायेंगे (कुरआन सूरह गाफिर-60)

إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ

हम सिर्फ तेरी ही इबादत करते हैं और तुझसे ही मदद चाहते हैं (कुरआन सूरह फातिहा-4)

فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ

तो आप अपने रब के लिए नमाज़ पढ़िये और क़ुरबानी करिए (कुरआन सूरह कौसर-2)

कलमा-ऐ-तौहीद की शर्तें

1 ज्ञान : कलमा का मतलब और मायना का इल्म होना जिसका उल्टा  ज़िहालत है (कुरआन सूरह मुहम्मद-19)

2 यक़ीन : कलमा का मतलब और मायना पर यक़ीन होना जिसका उल्टा शक है (कुरआन सूरह हुजरात-15)

3 इखलास : कलमा का इक़रार इखलास के साथ करना जिसका उल्टा शिर्क है (कुरआन सूरह बय्यिनाह-5)

4 मोहब्बत : कलमा और उसके तकाजों से मोहब्बत करना जिसका उल्टा दुश्मनी है (कुरआन सूरह बकराह-165)

5 सच्चाई : कलमे का इकरार सच्चाई के साथ करना जिसका उल्टा झूट है (कुरआन सूरह बकराह-8)

6 कबूल : कलमा और उसके शर्तों को स्वीकार करना जिसका उल्टा नकारना है (कुरआन सूरह सफ्फात-35)

7 इन्कियाद : कलमा और उसके तकाजों के साथ अमली इत्तेबा करना जिसका उल्टा छोड़ना है (कुरआन सूरह लुक़मान-22)

8 तागूत का इन्कार : कलमे को मानने के साथ झूठे माअबूदों का इन्कार करना (कुरआन सूरह बकराह-256)

 सबूत

فَاعْلَمْ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ

तो जान लो कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माअबूद नहीं (कुरआन सूरह मुहम्मद-19)

إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ

मोमिन तो वह है जो अल्लाह पर और उसके रसूल पर पक्का ईमान लाये फिर शक न करे और अपने मालो से और अपनी जानों से अल्लाह की राह में जद्दोजेहद करते रहें यही सच्चे हैं (कुरआन सूरह हुजरात-15)

وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ

उन्हें इसके सिवा कोई हुक्म नहीं दिया गया कि सिर्फ अल्लाह की इबादत करें उसी के लिए दीन को खालिस रखें (कुरआन सूरह बय्यिनाह-5)

وَمِنَ النَّاسِ مَن يَتَّخِذُ مِن دُونِ اللَّهِ أَندَادًا يُحِبُّونَهُمْ كَحُبِّ اللَّهِ ۖ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَشَدُّ حُبًّا لِّلَّهِ ۗ وَلَوْ يَرَى الَّذِينَ ظَلَمُوا إِذْ يَرَوْنَ الْعَذَابَ أَنَّ الْقُوَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا وَأَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعَذَابِ

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह का शरीक दूसरे को ठहरा कर उनसे ऐसी मोहब्बत रखते हैं, जैसी मोहब्बत अल्लाह से होनी चाहिए और ईमानवाले अल्लाह की मोहब्बत में बहुत सख्त होते हैं (कुरआन सूरह बकराह-165)

وَمِنَ النَّاسِ مَن يَقُولُ آمَنَّا بِاللَّهِ وَبِالْيَوْمِ الْآخِرِ وَمَا هُم بِمُؤْمِنِينَ

कुछ लोग कहते हैं हम अल्लाह पर और क़यामत के दिन पर ईमान रखते हैं लेकिन वह ईमानवाले नहीं हैं (कुरआन सूरह बकराह-8)

إِنَّهُمْ كَانُوا إِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ

यह वह (लोग) हैं कि जब इनसे कहा जाता है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा मआबूद नहीं तो ये घमंड करते थे (कुरआन सूरह सफ्फात-35)

وَمَن يُسْلِمْ وَجْهَهُ إِلَى اللَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَىٰ ۗ

और जो (आदमी) अपने आपको अल्लाह के ताबे कर दे और हो भी अच्छे अमल करने वाला तो यक़ीनन उसने मजबूत कड़ा थाम लिया (कुरआन सूरह लुक़मान-22)

 فَمَن يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ وَيُؤْمِن بِاللَّهِ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَىٰ

इस लिए जो इंसान अल्लाह के सिवा अन्य माअबूदों का इन्कार करके अल्लाह पर ईमान लाये उसने मजबूत कड़े को थाम लिया (कुरआन सूरह बकराह-256)

 

कुछ शक और उसके जवाब

 

1) क्या सिर्फ दिल से कलमा को जानना काफी है?                                                                                           नहीं, मिसाल के तौर पर नबी (सल्लल्लाहु अलेहि वस्सल्लम)  के चाचा  अबू तालिब (सही मुस्लिम :362)

 

2) क्या सिर्फ ज़बान से कलमा पढ़ना काफी है?                                                                                           नहीं, जैसे अब्दुल्लाह बिन अबी बिन सलूल  (कुरआन सूरह अल – निसा :145)

 

3) क्या कलमा पढ़ने वाला मुसलमान कभी शिर्क कर सकता है?                                                                          जी हाँ,  कर सकता है (कुरआन सूरह अल अनआम:82)

सबूत

   أهون أهل النار عذابا أبو طالب، وهو منتعل بنعلين، يغلي منهما دماغه

जहन्नम में सबसे हल्का अज़ाब अबू तालिब को होगी और उसे आग की दो जूतियाँ पहनायीं जायेंगी जिससे उसका दिमाग खौल रहा होगा (सही मुस्लिम-362)

إِنَّ الْمُنَافِقِينَ فِي الدَّرْكِ الْأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ وَلَن تَجِدَ لَهُمْ نَصِيرًا

यक़ीनन मुनाफिक़ जहन्नम के सबसे निचले हिस्से में होंगे और आप उनका कोई मदद करने वाला नहीं पायेंगे (कुरआन सूरह निसा-145)

الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُم بِظُلْمٍ أُولَٰئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُم مُّهْتَدُونَ

जो लोग ईमान लायें और अपने ईमान को शिर्क से न मिलायें उन्ही के लिये शान्ति है और वही हिदायत पर हैं (कुरआन सूरह अनआम-82)

 

मुस्लिम गिरोह और इलाह का मायना

जहमी, मोतज़ली, अशरी और मतरुदी जमात वाले इलाह का मायना बनाने वाला, रोज़ी देने वाला और तदबीर करने वाला करते हैं जो की सही नहीं है

ख्वारिज़ जमात इलाह का मायना हाकिम बताती है जो किताब व सुन्नत के खिलाफ है

जह्मी और सूफी के नज़दीक इलाह का मायना मअबूद और मौजूद के हैं जो की गलत है

और अहले सुन्नत वल जमात के यहां इलाह बामायना मअबूदे बरहक़ (सच्चा उपास्य) किया गया है और यही मायना कुरआन व सुन्नत के हिसाब से सही है

 

 

लेखक- शैख़ मुर्तुजा बिन बख्श हफिज़ुल्लाह

अनुवाद -अहमद अनवार

लोगो को सबसे बड़े गुनाह से कैसे रोकें?

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तआरुफ!

आप सबसे बड़े गुनाह से जिसे रोकना चाहते हैं उससे मुस्करा कर मिलिए फिर अपना मुख़्तसर तार्रुफ़ कराईये और बहुत ही नरम अन्दाज़ में उसका नाम और वह क्या काम करता है पूछ लीजिये । साथ में खैर खैरियत भी दरियाफ्त कर लीजिये ताकि आप एक दूसरे को सही से समझ सकें । शुरुवात में होने वाला यह छोटा सा तार्रुफ़ आपके लिए उसे दावत देने में काफी मददगार साबित होगा ।

शुरुवात कैसे करें?

अहसन अख़लाक़ के साथ उससे मुखातब हो कर कहिये की हम आपसे दीन के मुताल्लिक कुछ बात करना चाह रहें हैं । इसके जवाब में अक्सर लोग आपसे यही कहेंगे की हाँ कहिये क्या कहना चाहते हैं।

बस, फिर क्या है!

आप शुरू हो जाइये कि, भाई आपकी इजाज़त से मैं दीन की बात बताने से पहले एक बहुत ही आसान सा सवाल करना चाहता हूँ वह यह कि चोरी करना, बलात्कार करना, कत्ल करना, झूट बोलना, धोखा देना, गाली देना सब गुनाह है तो सबसे बड़ा गुनाह क्या रहेगा? वह कहेंगे कि झूट बोलना सबसे बड़ा गुनाह है या कहेंगे कि गाली देना सबसे बड़ा गुनाह है या कहेंगे बलात्कार करना वगैरा सबसे बड़ा गुनाह है । यकीन मानिये अक्सर लोग नही बता पायेंगे कि सबसे बड़ा गुनाह क्या है?

आप उनसे कहिये कि मैं आपकी थोड़ी मदद कर देता हूँ, वह गुनाह ऐसा है जिसे अल्लाह ताआला कभी माफ नही करेगा । जिसके करने से इंसान के ऊपर जन्नत हराम हो जाती है । जिसके करने से इंसान हमेशा हमेशा के लिये जहन्नम का मुस्तहिक बन जाता है । और वह ऐसा गुनाह है जिसे दुनिया के अक्सर लोग करते हैं। आपके इन इशारो से दो-चार लोग समझ जायेंगे कि आप किस गुनाह की बात कर रहें हैं । इनके अलावा बाकी लोग ये इशारे मिलने के बाद भी घुमा फिरा के वही बतायेंगे जो पहले बतायें थे कि झूट बोलना, गाली देना वगैरा ही सबसे बड़ा गुनाह है।

दावत के काम से जोड़िये!

जो लोग समझ गये हैं कि आप उनसे किस गुनाह की बात कर रहें उन्हे आप दावती काम से जोड़ने की कोशिश करें और दावती काम के लिये उभारते हुए उस गुनाह की मुख्तसर संगीनी बतायें और कहें की दुनिया के अक्सर लोग यह गुनाह कर रहें हैं उन्हे इससे कौन रोकेगा? कौन उन्हे बतायेगा कि ऐ मेरे भाई ये गुनाह मत कर अल्लाह ताआला इसे कभी माफ नही करेगा? क्या ये हमारा फर्ज नही की हम खुद भी इस गुनाह से बचें और लोगो को भी बचायें? यकिनन ये हमारा फर्ज है इसलिये हम चाहते हैं कि आप भी हमारे साथ जुड़कर इस गुनाह से लोगो को रोकें और जो लोग गैरउल्लाह की इबादत कर रहे हैं उन्हे उससे मना करके एक अल्लाह की इबादत की तरफ बुलायें क्योंकि यही वह रास्ता है जो पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वस्सल्लम और आपके मानने वालो का है । जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया

قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي ۖ وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ

“(आप) कह दीजिये यही मेरा रास्ता है, मैं और मेरे पैरोकार अल्लाह की तरफ बुला रहे हैं, पूरे यकीन और ऐतमाद के साथ और अल्लाह पाक है और मैं मुश्रिको में से नही ।” (कुरआन-12:108) इसलिये हमें भी इसी रास्ते पे चलकर लोगो को एक अल्लाह की तरफ बुलाना चाहिये।

इस तरह से ऐसे लोगो को जो पहले से ही सबसे बड़े गुनाह से बचते आ रहें हैं उन्हें आप दावत के काम से जोड़ने में कामयाब हो जायेंगे । जिसके बाद वह दूसरों को भी सबसे बड़े गुनाह से रोकने का काम करेंगे जो आपके लिए इंशाअल्लाह सदके जारिया बन जाएगा ।

सबसे बड़े गुनाह से रोकिये!

बाकी बचे ऐसे लोग जो झूट, गाली, गीबत वगैरा को सबसे बड़ा गुनाह मान रहे थे उनसे कहिये की भाई हम एक काम करते हैं कि कुरआन से ही पूछ लेते हैं की सबसे बड़ा गुनाह क्या है? क्योंकि आपके और मेरे जवाब से कुरआन का जवाब बेहतर रहेगा । याद रखिये आपके इस मश्विरे को हर कोई तस्लीम कर लेगा और आपके मुँह से कुरआन सुनने के लिये अपने कान खड़े कर लेगा । अब देर न करें लोहा गर्म है हाथौड़ा चला दें । और कुरआन की आयतें उनके सामने बयान करना शुरू कर दीजिये जिसके बारे में अल्लाह तआला ने फरमाया,

لَّا يَأْتِيهِ الْبَاطِلُ مِن بَيْنِ يَدَيْهِ وَلَا مِنْ خَلْفِهِ ۖ تَنزِيلٌ مِّنْ حَكِيمٍ حَمِيدٍ

”बतिल जिसके पास फटक भी नही सकता न उसके आगे से न उसके पीछे से, यह उतारी हुई है हिक्मत और तारीफ़ो वाले अल्लाह की तरफ से ।” (कुरआन-41:42) कुरआन की आयतों के सामने बातिल किसी भी तरह से टिक नहीं सकता इसलिये मदऊ के सामने इनका भरपूर तिलावत करें ।

और उन्हे सबसे बड़े गुनाह के बारे में बताते हुए कहिये कि, अगर हम कुरआन पढ़ते हैं तो सूरह लुक़मान की आयत 13 में अल्लाह तआला ने अपने पैगम्बर लुक़मान अलैहिस्सलाम का वाक़्या नक़ल किया है । जिसमें लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए कहते हैं कि

وَإِذْ قَالَ لُقْمَانُ لِابْنِهِ وَهُوَ يَعِظُهُ يَا بُنَيَّ لَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ ۖ إِنَّ الشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ

“और जब लुक़मान ने नसीहत करते हुए अपने लड़के से फरमाया कि ऐ मेरे बेटे, अल्लाह के साथ शिर्क न करना यकिनन शिर्क सबसे बड़ा गुनाह है” (कुरआन-31:13) इस आयत में सबसे बड़ा गुनाह शिर्क को कहा गया है । और यही वह गुनाह है जिसे अल्लाह तआला आखिरत में कभी माफ नही करेगा बाक़ी दूसरे गुनाह चाहेगा तो माफ कर देगा । यहाँ तक कि अगर एक इंसान ने इतना गुनाह किया की ज़मीन से लेकर आसमान तक पूरी जगह भर गई तो भी अल्लाह तआला चाहेगा तो अपनी रहमत से उसके सारे गुनाहो को माफ कर देगा । लेकिन शिर्क करने वाले को कभी माफ नही करेगा जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरआन में फरमाया

إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدِ افْتَرَىٰ إِثْمًا عَظِيمًا

“यकिनन अल्लाह तआला इस चीज़ को माफ नही करेगा कि कोई उसके साथ शिर्क करे और इसके अलावा जिसको चाहेगा माफ कर देगा, और जिसने अल्लाह के साथ शिर्क किया तो उसने अल्लाह पर भारी आरोप घड़ा ।” (कुरआन-4:48) इसी तरह दूसरी जगह भी अल्लाह तआला ने फरमाया

إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا

“यकिनन अल्लाह तआला अपने साथ शिर्क किये जाने को कभी माफ़ नही करेगा और इसके सिवा जिसे चाहेगा माफ़ कर देगा और जिसने अल्लाह के साथ शिर्क किया वह बहुत दूर बहक गया।” (कुरआन-4:116) अल्लाह तआला दूसरे गुनाह माफ़ कर देगा इसका मतलब ये नही कि दूसरे गुनाह कर सकते हैं । बल्कि दूसरे गुनाह को अल्लाह तआला चाहेगा तो माफ़ कर देगा या चाहेगा तो सज़ा देगा । इसलिये हमे सारे गुनाहो से बचना चाहिये लेकिन पहले शिर्क से क्योंकि इसे अल्लाह तआला कभी माफ़ नही करेगा । यह इतना खतरनाक गुनाह है कि इसके करने वाले पे अल्लाह तआला ने जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना जहन्नम बना दिया है ।

اِنَّهٗ مَنْ يُّشْرِكْ بِاللّٰهِ فَقَدْ حَرَّمَ اللّٰهُ عَلَيْهِ الْجَـنَّةَ وَمَأْوٰٮهُ النَّارُ ؕ  وَمَا لِلظّٰلِمِيْنَ مِنْ اَنْصَارٍ

“यकीनन जो अल्लाह के साथ शिर्क करेगा अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना जहन्नम है और इन ज़ालिमो (शिर्क करने वालो) का कोई मदगार न होगा ।” (कुरआन-5:72) शिर्क करने वाला कभी जन्नत में नहीं जा सकता क्योंकि उसका अंजाम हमेशा-हमेशा के लिये जहन्नम है । और इन शिर्क करने वालो का आखिरत में कोई सहायक और सिफारिशी भी नहीं होगा । जबकि दूसरे लोग जो शिर्क नहीं किये रहेंगे क़यामत के दिन अंबिया, फरिश्ते, औलिया, और ईमानवाले अल्लाह तआला के हुक्म से उनकी सिफ़ारिश करेंगे कि ऐ अल्लाह इन्हे माफ़ कर दे । इनकी सिफारिश अल्लाह ताआला कबूल फरमायेगा और उन्हें जहन्नम से निकाल कर जन्नत में डाल देगा लेकिन शिर्क करने वालो के लिये सिफ़ारिश या मदद करने की इजाजत किसी को नहीं मिलेगी इसलिए उनकी कोई सिफारिश नहीं कर सकेगा और न ही किसी तरह से उनकी कोई सहायक होगा जो उनकी मदद करे । जिसकी वजह से वह हमेशा-हमेशा जहन्नम में अजाब का मज़ा चखते रहेंगे ।

इस तरह से जब आप शिर्क की क़बाहतें उसके सामने बयान कर रहें होंगे तो वह बेक़रार हो उठेगा यह जानने के लिये कि शिर्क क्या होता है? और बीच-बीच में कई बार आपसे पूछेगा भी की शिर्क क्या है? शिर्क किस चीज़ को कहते है?

आप जल्दी न करें बल्कि उससे कहें कि, भाई बस थोड़ा सा रुक जाइये!

मैं ये बात पूरी कर लूँ फ़िर बताता हूँ

इसके बाद आप जहाँ पे शिर्क की क़बाहत बयान करते हुए रुके थे उससे आगे चलें और उससे कहें कि अगर हम कुरआन की सूरह अनआम, आयत 83 से 87 तक पढ़ेंगे तो इन पाँच आयतों में अल्लाह तआला ने आठरह (18) पैगम्बरो का ज़िक्र करने के बाद फरमाया

وَلَوْ اَشْرَكُوْا لَحَبِطَ عَنْهُمْ مَّا كَانُوْا يَعْمَلُوْنَ

कि “अगर ये लोग भी शिर्क करते तो इनके सारे अमल बरबाद हो जाते ।” इसी तरह तमाम  पैगम्बरो के सरदार मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वस्सल्लम) के बारे में भी अल्लाह तआला ने फरमाया

لَئِنْ اَشْرَكْتَ  لَيَحْبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُوْنَنَّ مِنَ الْخٰسِرِيْنَ

कि ऐ पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वस्सल्लम) “अगर आपने भी शिर्क किया तो आपके सारे अमल बरबाद हो जायेंगे और आप नुकसान उठाने वालो में से हो जायेंगे।” (कुरआन-39:65) जबकि अंबिया मासूम और गुनाहों से पाक होते हैं उसके बावजूद भी अल्लाह तआला ने शिर्क की संगीनी को वाजेह करने के लिए अंबिया का तजकिरा किया कि शिर्क करने पर न उनके नेक आमाल नुकसान से बच सकते हैं और न वह खुद तो हम शिर्क करके अपने आमाल और अपने आपको नुकसान से कैसे बचा सकते हैं ? जबकि अल्लाह ताआला ने अपने बन्दो पर जो-जो काम हराम कियें हैं उनमें से सबसे बड़ा हराम काम अल्लाह के साथ शिर्क करना ही है । और जब इंसान बड़ा हराम काम करेगा तो उसका नुकसान भी बड़ा होगा । अल्लाह तआला ने फरमाया

قُلْ تَعَالَوْا اَتْلُ مَا حَرَّمَ رَبُّكُمْ عَلَيْكُمْ اَلَّا تُشْرِكُوْا بِهٖ شَيْئًـــا وَّبِالْوَالِدَيْنِ اِحْسَانًا  ۚ  وَلَا تَقْتُلُوْۤا اَوْلَادَكُمْ مِّنْ اِمْلَاقٍ  ؕ  نَحْنُ نَرْزُقُكُمْ وَاِيَّاهُمْ  ۚ  وَلَا تَقْرَبُوا الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ  ۚ  وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِيْ حَرَّمَ اللّٰهُ اِلَّا بِالْحَـقِّ    ؕ  ذٰ لِكُمْ وَصّٰٮكُمْ بِهٖ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُوْنَ

कि “आप कहिये कि आओ मैं पढ़ कर सुनाऊँ कि तुम पर तुम्हारे रब ने कौनसी चीज़े हराम की हैं, वह ये कि उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न करो, माँ-बाप के साथ के साथ एहसान करो, और अपनी औलाद को गरीबी के सबब क़त्ल न करो, हम उनको और तुमको रोज़ी अता करते हैं और ज़ाहिर व छुपे फ़हाशी के क़रीब न जाओ और उस जान को जिसे अल्लाह ने मना किया है क़त्ल न करो”……. (कुरआन-6:151) इस आयत में अल्लाह तआला ने हराम की हुई चीज़ो का ज़िक्र करते हुए शिर्क को सबसे पहले रखा है । मतलब कि इंसान को सबसे पहले जिस हराम काम से बचना है वह शिर्क है । इसीलिये सारे पैगम्बर अपनी क़ौम को झूठ, गीबत, चोरी वगैरा से बाद में रोकते पहले शिर्क से रोकते थे । अल्लाह तआला ने फरमाया                                                                                                     وَلَـقَدْ بَعَثْنَا فِيْ كُلِّ اُمَّةٍ رَّسُوْلًا اَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوْتَ ۚ

“और हमने हर क़ौम में पैगम्बर भेजा कि सिर्फ अल्लाह की इबादत करो और तागूत से बचो”….. (कुरआन-16:36) पैगम्बरो के आने का बुनियादी मक़सद ही यही था की लोग शिर्क से दूर रहें ।

कहीं हमसे शिर्क तो नहीं हो रहा है?

हर पैगम्बर ने अपनी क़ौम को सबसे पहले शिर्क से ही मना किया इसके बावजूद भी आज अक्सर लोग अल्लाह के साथ शिर्क कर रहें हैं । जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया                                                           وَمَا يُؤْمِنُ اَكْثَرُهُمْ بِاللّٰهِ اِلَّا وَهُمْ مُّشْرِكُوْنَ 

“और अक्सर लोग अल्लाह पे ईमान रखने के बाद भी शिर्क करते हैं।” (कुरआन-12:106)

कुछ लोगो को ये लगता है कि जिसने एक बार क़लमा पढ़ लिया उससे कभी शिर्क नही हो सकता इसलिये आगे बढ़ने से पहले आप इस आयत के जरिये वाजेह कर दें कि क़लमा पढ़ने वाले और अल्लाह पे ईमान रखने वाले लोग भी शिर्क करते हैं । और हम भी ईमान वाले हैं । इसलिये हमें चाहिये की हम देखें कि कहीं हमसे तो शिर्क नही हो रहा है???

या कहीं हमारे घर वालों से तो नही हो रहा है ?

ताकि उन्हें शिर्क से रोक कर जहन्नम से बचा सकें, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया

يٰۤاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا قُوْۤا اَنْفُسَكُمْ وَاَهْلِيْكُمْ  نَارًا وَّقُوْدُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ عَلَيْهَا مَلٰٓئِكَةٌ غِلَاظٌ شِدَادٌ  لَّا يَعْصُوْنَ اللّٰهَ مَاۤ اَمَرَهُمْ وَيَفْعَلُوْنَ مَا   يُؤْمَرُوْنَ

“ऐ ईमान वालो अपने आपको और अपने घर वालो को उस आग से बचाओ जिसका ईंधन आदमी और पत्थर है जिस पर ऐसे सख्त फरिश्ते तैनात हैं जो अल्लाह के हुक़्म की नफ़रमानी नही करते और वही करते हैं जिसका उन्हे हुक्म दिया जाता है ।”

अगर हमने अपने आपको और अपने घर वालो को शिर्क से बचा लिया तो समझ लो कि हमने अपने आपको और अपने घर वालो हमेशा-हमेशा की जहन्नम के अज़ाब से बचा लिया । क्योंकि दूसरे गुनाह के बदले में हमे थोड़ा बहुत वक़्त जहन्नम रहना पड़ सकता है लेकिन हमेशा नही क्योंकि शिर्क न करने वाला मोमिन एक न एक दिन जन्नत में जरूर जायेगा ।

यहाँ तक पहुँचते- पहुँचते जिसे आप शिर्क से रोकना चाह रहे हैं वह मन ही मन में शिर्क की संगिनी और उसका अंजाम सुनकर उससे बचने का पुख्ता अहद कर चुका रहेगा । क्योंकि इसीलिए वह बीच-बीच में आपसे शिर्क के बारे में पूछ रहा था । अब वह शिर्क से बचने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका है । इसलिए उसे शिर्क की तारीफ बताते हुए कहिये कि शिर्क से हम उसी वक़्त बच सकते हैं जब हमें पता हो की शिर्क होता क्या है? शायद इसीलिये आप पूछ रहे थे कि शिर्क क्या चीज़ है? शिर्क का मतलब होता है मिलाना, साझी बनाना, पार्टनर ठहराना लेकिन शरियत के ऐतबार से इसकी तारीफ़ जो उलेमा ने बयान कि है वह यह है कि

अल्लाह के साथ इबादत में किसी को मिलाना 

अल्लाह के गुणों और विशेषताओ में किसी को मिलाना

और अल्लाह के जात में किसी को मिलाना

शिर्क है ।

 

अब उसके सामने अपने लिये भी और उसके लिये भी दुआ करें कि अल्लाह ताआला हमें सबसे बड़े गुनाह शिर्क से बचाये और जन्नातुल फ़िरदौस में जगह दे ।  अमीन!

आखिर में उससे कहें, हमें सारे गुनाहों से बचने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन सबसे पहले शिर्क से! फिर उससे सवालिया अन्दाज़ में पूछे सही न ? बचेंगे न इंशाअल्लाह? वह भी यही कहेगा हाँ इंशाअल्लाह जरूर!

देखा आपने, अल्लाह तआला की मदद से आप अपने मकसद में कामयाब हो गये । मुबारक हो, आप अल्लाह का शुक्र अदा कीजिये, उसकी पाकी बयान कीजिये, सजदे शुक्र बजा लाइये कि आपके जरिये से एक इंसान गुनाहे अजीम शिर्क बच गया मतलब वह हमेशा की जहन्नम से बच गया।

सबसे बड़े गुनाह से रोकने के बाद …

उसके अंदर की दूसरी और बुराइयाँ मिटाने के लिये और उसे मजीद दीनी मालूमात देने के लिए उसका और अपना राबता (संपर्क) नंबर आपस में शेयर (share) करलें । और हफ्ते में या दस दिन में फोन पर बात करके या मिलकर उससे राबते में रहें । अगर कोई दीनी इज्तेमा वगैरह हो तो उसे इन्फॉर्म करें और आने की दावत दें । हो सके तो उसके दिलचस्पी के हिसाब से उसे मोतबर दीनी किताबें पढ़ने को देते रहें । और अपने पहचान के दीनदार लोगो से उसका तार्रुफ़ करा दें जिससे वह अपने पुराने माहौल से निकल कर आसानी से दीनदार माहौल को अपनाने में कामयाब हो जायेगा । और समाज में एक नेक और दीनदार इंसान बनकर जिंदगी बसर करना शुरू कर देगा ।

लेखक-अहमद अनवर

संशोधक-शेख हाफिज अकबर अली सलफी हफिज़ुल्लाह

The Sermon of Farewell Hajj

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Prophet Muhammad (Peace and Blessings of Allah be upon him) is the last messenger who was sent for the guidance of mankind. When the prophet delivered the massage from Allah and fulfilled the mission he was sent for, he announced his intention for the Hajj in 632 C.E.

It was his first as well as last Hajj. After the prophet’s announcement an enormous number of Muslims rushed toward Makkah, reciting from the miqaat (stations at which the pilgrims of the Hajj put on Ihram):
“Labbaik Allahumma Labbaik! Labbaika laa shareeka laka labbaik, Innal Hamda wan ne’mata laka wal mulk, la shreeka lak”.

“Here I am, O Allah, here I am. Here I am, You have no partner, here I am. Indeed, all praise and blessings are Yours, and all sovereignty, You have no partner. (Sahih Bukhari-1549)

On this event, the prophet had the company of 124000 or 144000 Muslims, with whom he completed the rituals of Hajj and then gave a sermon, which in history has been recorded as “Khutba-e-Hajjatul Wa’da” (Sermon of the farewell Hajj).

He started the sermon praising Allah, then said:

ABOUT EQUALITY

“O people! Indeed, your Lord (Allah) is one and your father (Adam) is one. Indeed, there is no superiority of an Arab over a non-Arab, nor of a non-Arab over an Arab nor a black over white, expect by taqwa (Righteousness)” (Musnad Ahmed: V-5, Pg-411, Hadith no.-23489)

SECURITY

“O people!( Tell me) what is the day today?” The people replied, “It is the forbidden (sacred) day. ” He (Prophet Muhammed peace and blessings of Allah be upon him) asked again “ what town is this?” They replied, “ it is the forbidden (sacred) town. ”He asked, “ which month is this?” They replied, “It is a forbidden (sacred) month.” He said, “No doubt! Your blood, your properties, and your honour are sacred to one another like the sanctity of this day of yours, in this (sacred) town (Makka) of yours, in this ( sacred) month of yours.” (Sahih Bukhari – 1739)

FORGIVENESS & ABOLISHMENT OF USURY

“Behold! Everything pertaining to the Days of Ignorance is under my feet completely abolished. Abolished are also the blood- revenges of the Days of Ignorance . The first claim of ours on blood-revenge which I abolished is that of the son of Rabi’a bin al-Harith, who was nursed among the tribe of sa’d and killed by Hudhail. And the usury of the Days of Ignorance of abolished, and the first of our usury I abolished is that of ‘ Abbas bin ‘ Abdul Muttalib, for it is all abolished”_( Sahih Muslim-1218)

         

RIGHTS OF WIVES OVER HUSBAND & VICE VERSA

“Fear Allah concerning women! Verily you have taken them on the security if Allah, and intercourse with them has been made lawful unto you by words of Allah. You to have right over them, and that they should not allow anyone to sit on your bed whom you do not like. But if they do that , you can chastise them but not severely.

Their rights upon you are that you should provide them with food and clothing in a fitting manner ”. (Sahih Muslim-1218)

JUSTICE

“Beware! No sinner commits a sin but it is against himself. No father is to be punished for the sins of his child, and no child is to be punished for the sins of his father.” (Sunan Ibn Majah-3055)

TRUE GUIDANCE

“I have left among you the book of Allah ( Qur’an), and if you hold fast to it, you would never go astray.”(Sahih Muslim 1218)

“You will soon meet your Lord and He will ask you about your deeds. So do not turn after me unbelievers (or be misguided), some of you striking the necks of the other.” (Sahih Muslim-1679)

PATH OF PARADISE

“O’ people ! No prophet will be raised after me and no new Ummah (will be formed) after you.

Behold! Worship your Lord,

Offer prayers five times a day,

Observe fast in the month of Ramadhan

Pay readily the Zakat on your wealth,

Obey your Amir (Chief or leader)

And

you will be admitted to the Paradise of your Lord.”

(Al Moujam ul Kabeer :V-8,Pg-136,Hadith no-7535) (As saheeha-3233)

SPREAD THE MESSAGE

“It is a responsibility on those who are present to convey this message (of mine ) to those who are absent May be that some of those to whom it will be conveyed will understand it better than those who have actually heard it.”( Sahih Bukhari-4406)

BE WITNESS

The Prophet (peace and blessing of Allah be upon him ) said,“ And you would be asked about me (on the day of Resurrection ),what would you say?”

They (the audience) said:

“We will bear witness that you have conveyed ( the message), discharged ( the ministry of Prophet hood) and given wise (sincere) counsel.”

There upon Allah’s Messenger (peace and blessing of Allah be upon him) raised his forefinger towards the sky and the pointing it at the people (said ):

O Allah, be witness!

O Allah, be witness!

O Allah, be witness!

(Sahih Muslim -1218)

 

Compiled by-Ahmed Anwar

Revised by-Shaikh Hafiz Akbar Ali Salafi Hafizullah

इंसान का असली मकसद

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           आज समाज में बुराइयों के फैलने एक बड़ा कारण ये है कि लोगो ने अपने जीवन के असली मकसद को भूल कर दुनिया की माया-मोह जैसे धन दौलत, रुपया पैसा, गद्दी, औरत, प्रसिद्धि, भोग विलास को अपना असली मकसद बना लिया है। जिसे पाने के लिये वह झूट बोलते हैं चोरी करते हैं,  रिश्वत लेते हैं, धोखा देते हैं, कत्ल करते हैं इस तरह न जाने कितनी बुराइयां ये लोग समाज में करते फिरते हैं । जबकि धन दौलत, गद्दी, औरत, ये सारी चीज़े इंसान की जरुरत है न कि मकसद।

           इंसान का असल मकसद जन्नत (स्वर्ग) है। जब इंसान अपने इस असली मकसद को पहचान कर उसे पाने की कोशिश करता है तभी वह बुरे कामो से बचता है। क्योंकि वह जानता है कि बुरे कर्म करके वह अपने जीवन के असली मकसद जन्नत को नही पा सकता बल्कि अच्छे कर्म ही करके ही पा सकता है। इसलिये वह बुराइयों को छोड़ कर अच्छे कर्म करना शुरू कर देता है। अल्लाह की इबादत करना, माता-पिता की सेवा करना, लोगो के साथ भलाई करना, गरीबो को खिलाना, हर मामले में ईमानदार रहना, सच बोलना, रिश्ते-नाते जोड़ना, मुस्करा कर लोगो से मिलना, अमानत को लौटाना, वादा पूरा करना जैसे नेकी के कई कामो में उसके जिन्दगी के दिन-रात गुजरतें हैं। 

            सदव्यहार करने की यह भावना इंसान के अंदर जन्नत को अपना असली मकसद बनाने से ही आती है। इसीलिये अल्लाह ने कुरआन में फरमाया कि …”दौड़ो अपने पालनहार की माफ़ी की ओर और उस जन्नत की ओर जिसकी चौड़ाई आसमान और ज़मीन के बराबर है। जो तैयार की गई है, अल्लाह से डरने (नेकी के काम करने वाले और बुरे कामो से बचने वालो) के लिए।” (कुरआन-3:133) ताकि इंसान जन्नत को अपने जीवन का असली मकसद बना ले और बुराइयों से बचते हुए जीवन व्यतीत करे। जब वह ऐसा करता है तो दोनो लोक में उसे सफलता प्राप्त होती है। और वह सुखमय व शांतिमय जीवन व्यतीत करने  लगता है।

              आखिर में अल्लाह से दुआ है कि हमे जन्नत को अपना असली मकसद बनाने की तौफीक दे और दोनो जहाँ में हमे कामयाबी से नवाजे।

अमीन

अहमद अनवार

आज इस्लाम के बारे मे लोगो को पता है फ़िर बताने की जरुरत क्या है?

                                    हां, आज दुनिया के अक्सर लोग मिडिया से जुडे हैं जिसके वजह से उन्हे थोडा बहुत इस्लाम के बारे मे जानकारी है। लेकिन सही जानकारी नही है । क्योंकि ज्यादातर मिडिया वाले इस्लाम की तस्वीर गलत तरिके से पेश करते हैं । और लोगो को गलतफहमी मे मुब्तला कर देते हैं।

                                  इसलिये हमे लोगो के गलतफहमी को दूर करके इस्लाम का सही तस्वीर उनके सामने रखने की जरुरत है। ताकि लोगो को इस्लाम की सही इल्म हो सके। इसे एक मिसाल से भी समझा जा सकता है वो यह कि मक्का के मुशरिक को भी अल्लाह के बारे मे पता था जैसा कि खुद अल्लाह ने इस चीज का ज़िक्र कुरआन मे किया है फरमाया, “अगर आप इन (मुशरिको) से पूछे की इन्हे किसने पैदा किया है? तो यकिनन  वो यही कहेंगे की अल्लाह ने (कुरआन -43:87)  मुशरिक जानते थे की अल्लाह ही हमारा खालिक, रज़िक और पालनहार है उसके बावजूद भी पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वस्सल्लम उनके सामने अल्लाह का तर्रुफ़ (परिचय) पेश किया क्योंकि उन (मुशरिको) के पास अल्लाह के बारे में मालूमात तो थी। लेकिन सही मालूमात ना थी जिसकी वजह से वो अल्लाह के साथ दूसरे की भी इबादत करते थे । यानी शिर्क जो सबसे बड़ा गुनाह है, लेकिन जब पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वस्सल्लम ने उन्हे अल्लाह का सही तर्रुफ दिया तो कुछ दिनो के अंदर ही अक्सर मुशरिक ईमान लाकर मुस्लिम बन गये!

                                       इसलिये जरुरत है की लोगो की गलतफहमियो को दूर करके उन्हे इस्लाम की सही जानकारी दी जाये। अल्लाह तआला हमे दीन की सही समझ अता करे । अमीन

 

अहमद अनवार                                                      

वक़्त नही है…

 

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                 आज के दौर में जब हम लोगो को अल्लाह की इबादत की तरफ़ बुलाते हैं या कुरआन पढने, नमाज़ अदा करने, दीन की दावत देने को कहते हैं, तो अक्सर लोगो के ज़बान से यह सुनने को मिलता है की मेरे पास वक़्त नही है।

            जबकि पूरी ज़िंदगी, पैदाइश से लेकर मौत तक  का वक़्त अल्लाह ताआला ने हमे सिर्फ अपनी इबादत के लिये दिया।फरमाया “मैने जिन्नात और इन्सानो को सिर्फ इसीलिए पैदा किया है की वे केवल मेरी इबादत करें”(कुरआन-51:56) जिस काम के लिये अल्लाह की तरफ़ से हमे सालों साल का वक़्त मिला है उसी काम के लिये हमारे पास वक़्त नही है… 

         हम जानते हैं कि यकिनन जिन्दगी और मौत  अल्लाह ही के हाथ में है “और वही है जो जीवन प्रदान करता और मृत्यु देता है”…(कुरआन-23:80) लेकिन हमारे पास उसी के लिए वक़्त नही है जो जब चाहे हमे मौत देकर हमारा  वक़्त ही खत्म कर दे।

              सब लोगो के वक़्त पे अगर गौर किया जाये तो सबके पास चौबिस घंटे (24 Hours) ही होते हैं। जो लोग अल्लाह की इबादत करते हैं उनके पास भी और जो लोग नही करते उनके पास भी बात सिर्फ अहमियत की होती है। आदमी जिस काम को अहमियत देता है उसे करता है जिस काम को अहमियत नही देता उसे नही करता है। मिसाल के तौर पर मेरे इस लेख को पढने के बाद आने वाले एक घंटे तक हम चाहें तो दीन की पढाई करें चाहें तो अपने कारोबार में लग जायें चाहें तो दोस्तो के साथ घूमने निकल जायें। या कुछ और करें वक़्त तो हमारे पास एक ही घंटा है।लेकिन हम में से हर आदमी आने वाले एक घंटे में वही काम करेगा जो काम उसके नजदीक अहमियत वाली रहेगी।

            इसलिये अगर कोई यह कहे की मेरे पास फला काम के लिये वक़्त नही है। तो इसका साफ  मतलब यह है कि उसके नजदीक उस काम की अहमियत कम है या कुछ अहमियत नही है।

              अल्लाह ताआला से दुआ है की हमे दीनी अहकामात की अहमियत को समझने और उसके अनुसार जिन्दगी गुज़ारने की तौफीक दे! अमीन!

                                                                                                             अहमद अनवार