उम्मते मुस्लिमा सबके लिए

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इबादत का हुक्म

अल्लाह तआला ने सारे इन्सानों को अपनी इबादत के लिए पैदा किया है । और उन्हें इसी बात का हुक्म भी दिया कि सारे इन्सान अपने रब की ही इबादत करें ।

कुरआन को उसकी तरतीब से पढ़ने पर सबसे पहला हुक्म भी इबादत का ही मिलता है । जिसे अल्लाह तआला ने सिर्फ मस्जिद के इमामों, नमाजियों या मुसलमानों को ही नहीं दिया है । बल्कि कायनात में रहने वाले इन्सानों को दिया फरमाया की “ऐ इन्सानों अपने रब की इबादत करो जिसने तुम्हे और तुमसे पहले के लोगो को पैदा किया ताकि तुम परहेजगार बन जाओ ।“ (क़ुराआन-2:21)

 

कुरआन का पैगाम

कुरआन एक मुक़द्दस किताब है जिसे अल्लाह तआला ने हिदायत के लिए उतारा है । यह लारयेब किताब कुरआन पैगामे रहमान और अल्लाह की तरफ से नसीहत है । जो सीधे रास्ते की ओर रहनुमाई करती है । मगर सवाल ये है कि अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद को किसकी हिदायत? किसकी नसीहत? और किसकी रहनुमाई के लिए उतारा है? क्या सिर्फ आलिमों के लिए? क्या सिर्फ हाफिज़ो के लिए? क्या सिर्फ मदरसों के लिए? नहीं! बल्कि अल्लाह तआला ने फरमाया “रमज़ान का महीना है जिसमे कुरआन उतारा गया जो सारे इन्सानों के लिए हिदायत है” (कुरआन-2:185) कोई भी इन्सान किसी भी धर्म या मज़हब का हो या किसी भी जात-पात का हो कुरआन सबके लिए हिदायत है ।

कुरआन का हुक्म, उसका पैगाम और उसकी नसीहत कायनात के सारे इन्सानों के लिए है । इसीलिए कुरआन बिना किसी तरह के भेदभाव के सारे इन्सानों को एक समान मुखातब करता है । कहीं सारे इन्सानों को मुखातब करते हुए कहता है “ऐ इन्सानों तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से नसीहत आ चुकी है” (क़ुरआन-10:57) कहीं कहता है “ऐ इन्सानों तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से बुरहान और दलील आ चुकी है” (क़ुराआन-4:174) कहीं सारे इन्सानों को हुक्म देता है कि “ऐ इन्सानों अपने रब से डरो बेशक क़यामत का ज़लज़ला बहुत बड़ी चीज़ है”। (कुरआन-22:1) कहीं तौहीद की तालीम देते हुए कहता है “यह कुरआन सारे इन्सानों के लिए पैगाम है कि इसके ज़रिये बाखबर कर दिये जायें और पूरी तरह से मालूम करलें कि अल्लाह एक ही इबादत के लायक है और ताकि अक्लमंद लोग सोच समझ लें” । (कुरआन-14:52) और कहीं अपनी वअज़ और नसीहत को सारे इन्सानों के लिए बताते हुए कहता है कि “यह कुरआन सारे जहाँनों के लिए नसीहत (उपदेश) है” । (कुरआन-81:27)

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की रिसालत

दुनिया में तशरीफ़ लाने वाले सारे रसूलों में मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म)  अल्लाह तआला के आखिरी रसूल हैं । अल्लाह तआला ने आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) को बशीर व नज़ीर, सिराजे मुनीर , दाई व हादी और रसूले आमीन बनाकर भेजा । मगर सवाल है कि

किसके लिए रसूल बनाकर भेजा?

क्या सिर्फ अरबो के लिए?

क्या सिर्फ मुसलमानों के लिए?

क्या सिर्फ किसी खास रंग या नस्ल वालों के लिए?

क्या सिर्फ किसी खास मुल्क या वतन वालो के लिए?

नहीं! बल्कि जहाँ में रहने वाले सारे इन्सानों के लिए रसूल बनाकर भेजा । अल्लाह तआला ने फरमाया “[ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म)] कह दीजिए की ऐ इन्सानों मै तुम सबकी तरफ उस अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूँ जिसकी बादशाही तमाम आसमानों और ज़मीन में हैं” । (क़ुराआन-7:158)

कोई भी इन्सान किसी भी रंग या नस्ल का हो, किसी भी मुल्क या देश का हो दुनिया के तमाम इन्सानों के लिये मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) रसूल हैं । आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) सारे इन्सानों को रब का पैगाम सुनाने के लिए भेजे गए । इसीलिए आप ने सिर्फ कुछ  महदूद लोगो को ही नही बल्कि कायनात के सारे इन्सानों को तौहीद की दावत देते हुये फरमाया कि “ऐ इन्सानों कहो ला इलाहा इल्लल्लाह कामयाब हो जाओगे“ (इब्ने हिब्बान : 6562) आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) सारे इन्सानों को अल्लाह की तरफ बुलाने वाले दाई और रहनुमा हैं । अल्लाह तआला ने आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) को तमाम लोगों के लिए खुश्खबरी देने वाला और और डराने वाला बनाकर भेजा । और कुरआन में फरमाया कि “हमने तुमको [ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म)] तमाम इन्सानों के लिए खुश्खबरी देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते हैं” । (कुरआन-34:28) कि आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) सबके लिए भेजे गए और आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की रिसालत, तालीमात और पैगाम सबके लिए है ।

 

उम्मते मुस्लिमा

तमाम उम्मतों में उम्मते मुस्लिमा अफज़ल तरीन उम्मत है । जिसे अल्लाह तआला ने इबादत का हुक्म , कुरआन का पैगाम और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की रिसालत की दावत व तब्लीग के ज़रिये भलाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने के लिए निकाला है ।

मगर सवाल यह है कि दावत व तब्लीग किसको करें ?

किसे भलाई का हुक्म दे और किसे बुराई से रोके?

क्या सिर्फ जान पहचान के अपने से कमज़ोर लोगो को?

क्या सिर्फ मस्जिद में आने वाले चंद मुसलमानों को या सिर्फ अपने मसलक के दीनदार लोगो को ?

नहीं! बल्कि सारे इन्सानों के लिए जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया कि “तुम बेहतरीन उम्मत हो जो इन्सानों के लिए निकाली गई है तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो” । (कुरआन-3:110)

उम्मते मुस्लिमा धरती पे बसने वाले सारे इन्सानों की भलाई और रहनुमाई के लिए निकली गई है । चाहे कोई अमीर हो या गरीब, जानता हो या नेता, पोलिस वाले हों या मुजरिम, फिल्मी अदाकार हो या मैच के खिलाड़ी, तिजारत पेशा लोग हों या धार्मिक गुरु, लामज़हब लोग हों या गैर मज़हब के मानने वाले उम्मते मुस्लिमा सबके लिए है । सबको भलाई का हुक्म देने और सबको बुराई से रोकने के लिए है । जिस तरह इबादत का हुक्म, कुरआन का पैगाम और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की  रिसालत सबके लिए है उसी तरह उम्मते मुस्लिमा भी सबके लिए है । कि सारे इन्सानों तक पहुँच कर बिला खौफ व झिझक उन्हें भलाई का हुक्म दे और बुराई से रोके । यही उम्मते मुस्लिमा का सबसे बड़ा मकसद और सबसे अहम् फरीज़ा है । इसी अज़ीम मकसद के लिए अल्लाह तआला ने इस उम्मत को निकाला है । और इसी काम की वज़ह से  इस उम्मत को खैरे उम्मत का लक़ब दिया है ।

अल्लाह तआला के सारे पैगम्बर इसी मकसद के लिए भेजे गये थे । और आखरी पैगम्बर (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) का भी दावत व तब्लीग और भलाई का हुक्म करना और बुराई से रोकना ही असल मकसद था । इसी मकसद को लेकर आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) अरब में उठे । और जिन लोगो ने आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की दावत को कबूल किया उनके साथ मिलकर आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) अपने मिशन ‘अम्र बिल मअरूफ़ नहय अनिल मुन्कर’ के जरिये सबकी हिदायत व रहनुमाई करते रहे । चाहे वह मक्का के मुश्रिक हों या मदीने के मुनाफ़िक, देहात के बददु हों या सरदारे कुरेश, मदीने के यहूदी हों या नज़रान के ईसाई आप सबको दावत व तब्लीग करते रहे । जिसके नतीज़े में अरब की कौम जहाँ जुल्म व सितम एक आम चीज़ थी । और कौम शिर्क, ज़िना, रंगनस्ल के बिगाड़, क़त्ल, शराब नोशी जैसी कई बुराइयों में डूबी हुई थी। वही कौम दुनिया की सबसे अफज़ल कौम बनकर सिर्फ उभरती ही नहीं है बल्कि दुनिया को भी बेहतर बनने का सबक देते हुई नज़र आती है । जिसके बारे में अर्श वाले ने फरमाया था कि

“अल्लाह इनसे राज़ी यह अल्लाह से राज़ी” (क़ुराआन-9:110)

और कहने वाले ने कहा कि :-

“जो खुद न थे राह पे औरों के हादी बन गए

क्या नज़र थी जिसने मुर्दों को मसीहा कर दिया”

पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) के बाद दीन को लोगो तक पहुँचाने की जिम्मेदारी पूरी तरह सहाबा (रज़िअल्लाहु अन्हुम अज़मईन) के कंधो पे आ गई । सहाबा (रज़िअल्लाहु अन्हुम अज़मईन) हर मामले की तरह दावत व तब्लीग के मामले में भी आप के राह पे गामजन रहे । और दीन को अपने घर और समाज तक महदूद नहीं रखा बल्कि आप (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) के फ़रमान “जो हाज़िर है वह गायब तक पहुँचा दे” (सही बुखारी :1739) के मुताबिक़ पूरी दुनिया में फ़ैल गये । और दुनिया वालो को तौहीद का दर्स देकर मुन्करात से रोकना शुरू कर दिया । कुरआन व सुन्नत की रोशनी चारों तरफ फैला दी । तागूत का मलियामेट किया और बातिल का सर कुचल कर उसका नाश कर दिया । बिना किसी मलामत करने वाले की मलामत की परवाह किये जुल्म करने वाले ज़ालिमो के हाथ रोक दिये भलाई करने वाले हाथो को मजबूती  दी । और जुल्म सितम का नाम व निशान मिटाकर अल्लाह का फर्ज़ किया हुआ ‘अम्र बिल मअरूफ व नहय अनिल मुन्कर’ का फरीज़ा कमा हक्क़हु अदा कर दिया । जिसकी बरकत से मगरिब व मशरिक में ला इलाहा इल्लल्लाह की सदायें गुजने लगीं । लोग गिरोह दर गिरोह दीने इस्लाम में दाखिल होते गये । इस्लाम की रोशनी फैलते ही दुनिया इन्साफ व अम्नो अमान पर मब्नी एक खुशहाल और बेमिसाल गुलशन में बदल गई । जब तक उम्मते मुस्लिमा ‘अम्र बिल मअरूफ नहय अनिल मुन्कर’ के फ़रीज़े को सही ढंग से अंजाम देती रही उस वक़्त तक ये उम्मत दुनिया की इमामत व कयादत करती रही । और हर जगह सुख शांति कायम रही ।

 

मगर जब इस काम से उम्मत ने मुँह मोड़ा और उसका हक़ अदा करने में कोताही की तो फिर उम्मते मुस्लिमा की अज़मत ज़िल्लत में और बुलंदी पस्ती में बदल गई । और ज़ालिमो के दिलो से मुसलमानों का रोअब खत्म हो गया जिसका फायदा उठा कर ज़ुल्म करने वालो ने ज़ुल्म व सितम का  बाज़ार  गरम कर दिया है । और सब जगह गैरुल्लाह की इबादत, कत्ल व खूरेंजी, फ़िस्क व फुजूर जैसी कई बुराइयाँ आम कर दी है । जिससे दुनियाये इन्सानियत बुराइयों के दल-दल में डूबने लगी है । और हर तरफ बदअम्नी और फितना फसाद का दौर-दौरा हो गया है ।

 

अब जरुरत है कि उम्मते मुस्लिमा आगे बढ़े और ‘अम्र बिल मअरूफ नहय अनिल मुन्कर’ के फ़रीज़े को बिलकुल उसी तरह से अंजाम दे जैसा पैगम्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) और असलाफ़ ने अंजाम दिया था ।  ताकि मज़लूमों की मदद हो और ज़ालिम ज़ुल्म करने से रुक सके ।  शिर्क, ज़िना, दहशतगर्दी, क़त्ले-आम, ज़ुल्म व सितम जैसी सारी बुराइयों का नाम निशान मिट सके । दुनिया इन्साफ अम्न व अमान से भर जाये ।  उल्फत व मोहब्बत का खुशगवार माहौल बनें ।  लोग गुमराही के अन्धेरो से निकल सिराते मुस्तक़ीम की रौशन राह पे गामजन हो जायें । और सब एक रब की बन्दगी करने वाले बनकर आपस में भाई-भाई की तरह समाज में मिल-जुल कर रहने वाले बन जायें ।

नबी (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्ल्म) की बशारत है कि “यह दीन वहाँ तक पहुँचेगा जहाँ तक रात और दिन का उलट फेर ज़ारी है । अल्लाह तआला रुए ज़मीन पर कोई कच्ची झोपड़ी या पुख्ता मकान ऐसा नहीं छोड़ेगा जिसमें दीन दाखिल न हो ।”(मुस्नद अहमद 4 ⁄⁄⁄ 103)

अहमद अनवार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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